शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

CLass 5 Hindi Vasant CBSE

कक्षा (Class) -  पांचवीं (5th)
विषय (Subject) - हिंदी (Hindi)
किताब का नाम (Book Name): रिमझिम (Rimjhim)

विषय - सूची

अपनी-अपनी रंगतें

1. राख की रस्सी (लोककथा)
दुनिया की छत
2. फसलों के त्योहार (लेख)
3. खिलौनेवाला (कविता)
ईदगाह
हवाई छतरी
4. नन्हा फनकार (कहानी)
5. जहाँ चाह वहाँ राह (लेख)
कहाँ क्या है

बात का सफर

पत्र
6. चिट्टी का सफर (लेख)
7. डाकिए की कहानी, कँवरसिंह की जुबानी (भेंटवार्ता)
8. वे दिन भी क्या दिन थे (विज्ञान कथा)
9. एक माँ की बेबसी (कविता)
मज़ाखटोला
10. एक दिन की बादशाहत (कहानी)
11. चावल की रोटियाँ (नाटक)
12. गुरु और चेला (कविता)
बिना जड़ का पेड़
13. स्वामी की दादी (कहानी)
कार्टून
आस-पास
14. बाघ आया उस रात (कविता)
एशियाई शेर के लिए मीठी गोलियाँ
15. बिशन की दिलेरी (कहानी)
रात भर बिलखते - चघाड़ते रहे
16. पानी रे पानी (लेख)
नदी का सफर
17. छोटी-सी हमारी नदी (कविता)
जोड़ासाँको वाला घर
18. चुनौती हिमालय की (यात्रा वर्णन)
हम क्या उगाते हैं

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

पुत्र -प्रेम (कहानी) लेखक : मुंशी प्रेमचंद

पुत्र -प्रेम
 (कहानी)      

        
लेखक :
 मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

बाबू चैतन्यदास ने अर्थशास्त्र खूब पढ़ा था, और केवल पढ़ा ही नहीं था, उसका यथायोग्य व्यवहार भी वे करते थे। वे वकील थे, दो-तीन गांवों में उनकी जमींदारी भी थी, बैंक में भी कुछ रुपये थे। यह सब उसी अर्थशास्त्र के ज्ञान का फल था। जब कोई खर्च सामने आता तब उनके मन में स्वभावतः: प्रश्न होता था - इससे स्वयं मेरा उपकार होगा या किसी अन्य पुरुष का? यदि दो में से किसी का कुछ भी उपकार न होता तो वे बड़ी निर्दयता से उस खर्च का गला दबा देते थे। ‘व्यर्थ' को वे विष के समाने समझते थे। अर्थशास्त्र के सिद्धांत उनके जीवन-स्तम्भ हो गये थे।

बाबू साहब के दो पुत्र थे। बड़े का नाम प्रभुदास था, छोटे का शिवदास। दोनों कालेज में पढ़ते थे। उनमें केवल एक श्रेणी का अन्तर था। दोनों ही चतुर, होनहार युवक थे। किन्तु प्रभुदास पर पिता का स्नेह अधिक था। उसमें सदुत्साह की मात्रा अधिक थी और पिता को उसकी जात से बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं। वे उसे विद्योन्नति के लिए इंग्लैण्ड भेजना चाहते थे। उसे बैरिस्टर बनाना उनके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी।




किन्तु कुछ ऐसा संयोग हुआ कि प्रभुदास को बी०ए० की परीक्षा के बाद ज्वर आने लगा। डाक्टरों की दवा होने लगी। एक मास तक नित्य डॉक्टर साहब आते रहे, पर ज्वर में कमी न हुई दूसरे डॉक्टर का इलाज होने लगा, पर उससे भी कुछ लाभ न हुआ। प्रभुदास दिनों दिन क्षीण होता चला जाता था। उठने-बैठने की शक्ति न थी यहां तक कि परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने का शुभ-संवाद सुनकर भी उसके चेहरे पर हर्ष का कोई चिह्न  न दिखाई दिया। वह सदैव गहरी चिन्ता में डूबा रहाता था । उसे अपना जीवन बोझ सा जान पड़ने लगा था। एक रोज चैतन्यदास ने डॉक्टर साहब से पूछा यह क्या बात है कि दो महीने हो गये और अभी तक दवा का कोई असर नहीं हुआ ?

डाक्टर साहब ने सन्देह जनक उत्तर दिया- मैं आपको संशय में नहीं डालना चाहता। मेरा अनुमान है कि यह टयुबरक्युलासिस(TB)है ।

चैतन्यदास ने व्यग्र होकर कहा - तपेदिक ?

डॉक्टर - जी, हाँ ! उसके सभी लक्षण दिखायी देते हैं ।

चैतन्यदास ने अविश्वास के भाव से कहा मानों उन्हें विस्मयकारी बात सुन पड़ी हो -तपेदिक हो गया !

डॉक्टर ने खेद प्रकट करते हुए कहा- यह रोग बहुत ही गुप्त रीति से शरीर में प्रवश करता है।

चैतन्यदास - मेरे खानदान में तो यह रोग किसी को न था।

डॉक्टर - सम्भव है, मित्रों से इसके जर्म (कीटाणु ) मिले हो।

चैतन्यदास कई मिनट तक सोचने के बाद बोले- अब क्या करना चाहिए ।

डॉक्टर -दवा करते रहिये । अभी फेफड़ों तक असर नहीं हुआ है इनके अच्छे होने की आशा है ।

चैतन्यदास - आपके विचार में कब तक दवा का असर होगा?

डॉक्टर - निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता । लेकिन तीन चार महीने में वे स्वस्थ हो जाएँगे । जाड़ों में इस रोग का जोर कम हो जाया करता है ।

चैतन्यदास - अच्छे हो जाने पर ये पढ़ने में परिश्रम कर सकेंगे ?

डॉक्टर - मानसिक परिश्रम के योग्य तो ये शायद ही हो सकें।

चैतन्यदास - किसी सेनेटोरियम (पहाड़ी स्वास्थ्यालय) में भेज दूँ तो कैसा हो?

डॉक्टर - बहुत ही उत्तम ।

चैतन्यदास तब ये पूर्णरीति से स्वस्थ हो जाएँगे?

डॉक्टर - हो सकते है, लेकिन इस रोग को दबा रखने के लिए इनका मानसिक परिश्रम से बचना ही अच्छा है।

चैतन्यदास नैराश्य भाव से बोले - तब तो इनका जीवन ही नष्ट हो गया।


3

गर्मी बीत गयी। बरसात के दिन आये, प्रभुदास की दशा दिनों दिन बिगड़ती गई। वह पड़े-पड़े बहुधा इस रोग पर की गई बड़े- बड़े डाक्टरों की व्याख्याएँ पढ़ा करता था। उनके अनुभवों से अपनी अवस्था की तुलना किया करता था। उनके अनुभवों से अपनी अवस्था की तुलना किया करता। पहले कुछ दिनों तक तो वह अस्थिर-चित सा हो गया था। दो-चार दिन भी दशा संभली रहती तो पुस्तकें देखने लगता और विलायत यात्रा की चर्चा करता । दो चार दिन भी ज्वर का प्रकोप बढ़ जाता तो जीवन से निराश हो जाता । किन्तु कई मास के पश्चात जब उसे विश्वास हो गया कि इस रोग से मुक्त होना कठिन है तब उसने जीवन की भी चिन्ता छोड़ दी पथ्यापथ्य का विचार न करता , घरवालों की निगाह बचाकर औषधियाँ जमीन पर गिरा देता मित्रों के साथ बैठकर जी बहलाता। यदि कोई उससे स्वास्थ्य के विषय में कुछ पूछता तो चिढ़कर मुँह मोड़ लेता । उसके भावों में एक शान्तिमय उदासीनता आ गई थी, और बातों में एक दार्शनिक मर्मज्ञता पाई जाती थी । वह लोक रीति और सामाजिक प्रथाओं पर बड़ी निर्भीकता से आलोचनाएँ किया करता । यद्यपि बाबू चैतन्यदास के मन में रह-रहकर शंका उठा करती थी कि जब परिणाम विदित ही है तब इस प्रकार धन का अपव्यय करने से क्या लाभ तथापि वे कुछ तो पुत्र-प्रेम और कुछ लोक-मत के भय से धैर्य के साथ दवा-दर्पन करते जाते थे ।

जाड़े का मौसम था। चैतन्यदास पुत्र के सिरहाने बैठे हुए डॉक्टर साहब की ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देख रहे थे। जब डॉक्टर साहब टेम्परेचर लेकर (थर्मामीटर लगाकर ) कुर्सी पर बैठे तब चैतन्यदास ने पूछा- अब तो जाड़ा आ गया। आपको कुछ अन्तर मालूम होता है ?

डॉक्टर - बिलकुल नहीं , बल्कि रोग और भी दुस्साध्य होता जाता है।

चैतन्यदास ने कठोर स्वर में पूछा - तब आप लोग क्यो मुझे इस भ्रम में डाले हुए थे कि जाड़े में अच्छे हो जाएँगे ? इस प्रकार दूसरों की सरलता का उपयोग करना अपना मतलब साधने का साधन हो तो हो इसे सज्जनता कदापि नहीं कह सकते।

डॉक्टर ने नम्रता से कहा- ऐसी दशाओं में हम केवल अनुमान कर सकते है और अनुमान सदैव सत्य नहीं होते। आपको जेरबारी अवश्य हुई पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ  कि मेरी इच्छा आपको भ्रम में डालने के नहीं थी ।

शिवादास बड़े दिन की छुटिटयों में आया हुआ था, इसी समय वह कमरे में आ गया और डॉक्टर साहब से बोला - आप पिता जी की कठिनाइयों का स्वयं अनुमान कर सकते हैं । अगर उनकी बात नागवार लगी तो उन्हें क्षमा कीजिएगा।
चैतन्यदास ने छोटे पुत्र की ओर वात्सल्य की दृष्टि से देखकर कहा-तुम्हें यहां आने की जरूरत थी? मैं तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ कि यहाँ मत आया करो । लेकिन तुमको सबर ही नहीं होता ।

शिवादास ने लज्जित होकर कहा- मैं अभी चला जाता हूँ। आप नाराज न हों । मैं केवल डॉक्टर साहब से यह पूछना चाहता था कि भाई साहब के लिए अब क्या करना चाहिए ।

डॉक्टर साहब ने कहा- अब केवल एक ही साधन और है इन्हें इटली के किसी सेनेटारियम में भेज देना चाहिये ।

चैतन्यदास ने सजग होकर पूछा- कितना खर्च होगा?

‘ज्यादा से ज्यादा तीन हजार । साल भर रहना होगा?'

-निश्चय है कि वहां से अच्छे होकर आंवेंगे?

-जी नहीं, यहाँ तो यह भयंकर रोग है साधारण बीमारियों में भी कोई बात निश्चय रुप से नहीं कही जा सकती ।‘

-इतना खर्च करने पर भी वहाँ से ज्यों के त्यों लौट आये तो?

-तो ईश्वर की इच्छा। आपको यह तसकीन हो जाएगी कि इनके लिए मैं जो कुछ कर सकता था। कर दिया ।


4

आधी रात तक घर में प्रभुदास को इटली भेजने के प्रस्ताव पर वाद-विवाद होता रहा। चैतन्यदास का कथन था कि एक संदिग्ध फल के लिए तीन हजार का खर्च उठाना बुद्धिमत्ता के प्रतिकूल है। शिवदास उनसे सहमत था । किन्तु उसकी माता इस प्रस्ताव का बड़ी दृढ़ता के साथ विरोध कर रही थी। अंत में माता के धिक्कारो का यह फल हुआ कि शिवदास लज्जित होकर उसके पक्ष में हो गया बाबू साहब अकेले रह गये । तपेश्वरी ने तर्क से काम लिया । पति के सद्भावों को प्रज्वलित करने की चेष्टा की ।धन की नश्वरता की लोकोक्तियाँ कहीं इन शस्त्रों से विजय लाभ न हुआ तो अश्रु वर्षा करने लगी । बाबू साहब जल-बिन्दुओं क इस प्रहार के सामने न ठहर सके । इन शब्दों में हार स्वीकार की- अच्छा भाई रोओ मत। जो कुछ कहती हो वही होगा।

तपेश्वरी - तो कब ?

‘रुपये हाथ में आने दो ।'

‘तो यह क्यों नहीं कहते कि भेजना ही नहीं चाहते?'

भेजना चाहता हूँ किन्तु अभी हाथ खाली हैं। क्या तुम नहीं जानतीं?'

‘बैक में तो रुपये है? जायदाद तो है? दो-तीन हजार का प्रबन्ध करना ऐसा क्या कठिन है?'

चैतन्यदास ने पत्नी को ऐसी दृष्टि से देखा मानो उसे खा जाएँगे और एक क्षण के बाद बोले - बिलकुल बच्चों की सी बातें करती हो। इटली में कोई संजीवनी नहीं रक्खी हुई है जो तुरन्त चमत्कार दिखायेगी । जब वहाँ भी केवल प्रारब्ध ही की परीक्षा करनी है तो सावधानी से कर लेंगे । पूर्व पुरुषो की संचित जायदाद और रखे हुए रुपये मैं अनिश्चित हित की आशा पर बलिदान नहीं कर सकता।

तपेश्वरी ने डरते - डरते कहा- आखिर, आधा हिस्सा तो प्रभुदास का भी है?
बाबू साहब तिरस्कार करते हुए बोले - आधा नहीं, उसको मैं अपना सर्वस्व दे देता, जब उससे कुछ आशा होती, वह खानदान की मर्यादा और ऐश्वर्य बढ़ाता और इस लगाये हुए धन के फलस्वरूप कुछ कर दिखाता । मैं केवल भावुकता के फेर में पड़कर धन का ह्रास नहीं कर सकता ।

तपेश्वरी अवाक रह गयी। जीतकर भी उसकी हार हुई ।

इस प्रस्ताव के छ: महीने बाद शिवदास बी.ए पास हो गया। बाबू चैतन्यदास ने अपनी जमींदरी के दो आने बन्धक रखकर कानून पढ़ने के निमित्त उसे इंग्लैड भेजा । उसे बम्बई तक खुद पहुँचाने गये ।वहाँ से लौटे तो उनके अतं: करण में सदिच्छायों से परिमित लाभ होने की आशा थी उनके लौटने के एक सप्ताह पीछे अभागा प्रभुदास अपनी उच्च अभिलाषाओं को लिये हुए परलोक सिधारा ।


5

चैतन्यदास मणिकर्णिका घाट पर अपने सम्बन्धियों के साथ बैठे चिता - ज्वाला की ओर देख रहे थे । उनके नेत्रों से अश्रु धारा प्रवाहित हो रही थी । पुत्र-प्रेम एक क्षण के लिए अर्थ-सिद्धांत पर गालिब हो गया था। उस विरक्तावस्था में उनके मन में यह कल्पना उठ रही थी । सम्भव है, इटली जाकर प्रभुदास स्वस्थ हो जाता । हाय! मैंने तीन हजार का मुँह देखा और पुत्र रत्न को हाथ से खो दिया। यह कल्पना प्रतिक्षण सजग होती थी और उनको ग्लानि, शोक और पश्चात्ताप के बाणों से बेध रही थी । रह -रहकर उनके हृदय में वेदना की शूल-सी उठती थी । उनके अन्तर की ज्वाला उस चिता -ज्वाला से कम दग्धकारिणी न थी। अकस्मात उनके कानों में शहनाइयों की आवाज आयी। उन्होंने आँख ऊपर उठाई तो मनुष्यों का एक समूह एक अर्थी के साथ आता हुआ दिखाई दिया। वे सब के सब ढोल बजाते, गाते, पुष्प आदि की वर्षा करते चले आते थे । घाट पर पहुँचकर उन्होंने अर्थी उतारी और चिता बनाने लगे । उनमें से एक युवक आकर चैतन्यदास के पास खड़ा हो गया। बाबू साहब ने पूछा -किस मुहल्ले में रहते हो?

युवक ने जवाब दिया- हमारा घर देहात में है । कल शाम को चले थे । ये हमारे बाप थे । हम लोग यहाँ  कम आते हैं, पर दादा की अन्तिम इच्छा थी कि हमें मणिकर्णिका घाट पर ले जाना ।

चैतन्यदास -ये सब आदमी तुम्हारे साथ हैं ?

युवक -हाँ, और लोग पीछे आते है । कई सौ आदमी साथ आये है। यहाँ  तक आने में सैकड़ों उठ गये पर सोचता हूँ कि बूढे पिता की मुक्ति तो बन गई । धन और है किसलिए ?

चैतन्यदास- उन्हें क्या बीमारी थी ?

युवक ने बड़ी सरलता से कहा, मानो वह अपने किसी निजी सम्बन्धी से बात कर रहा हो। ‘बीमारी का किसी को कुछ पता नहीं चला। हरदम ज्वर चढ़ा रहता था। सूखकर कांटा हो गये थे । चित्रकूट हरिद्वार प्रयाग सभी स्थानों में ले लेकर घूमे । वैद्यों ने जो कुछ कहा उसमें  कोई कसर नहीं की।

इतने में युवक का एक और साथी आ गया। और बोला -साहब, मुँह  देखा बात नहीं, नारायण लड़का दे तो ऐसा दे । इसने रुपयों को ठीकरे समझा ।

घर की सारी पूंजी पिता की दवा -दारु में स्वाहा कर दी । थोड़ी सी जमीन तक बेच दी पर काल-बलि के सामने आदमी का क्या बस है।

युवक ने गदगद स्वर से कहा - भैया, रुपया पैसा हाथ का मैल है। कहाँआता है, कहाँ  जाता है, मुनष्य नहीं मिलता। जिन्दगानी है तो कमा खाऊंगा। पर मन में यह लालसा तो नहीं रह गयी कि हाय! यह नहीं किया, उस वैद्य के पास नहीं गया, नहीं तो शायद बच जाते। हम तो कहते है कि कोई हमारा सारा घर- द्वार लिखा ले केवल दादा को एक बोल बुला दे । इसी माया-मोह का नाम जिन्दगानी हैं , नहीं तो इसमें क्या रक्खा है? धन से प्यारी जान, जान से प्यारा ईमान । बाबू साहब आपसे सच कहता हूँ अगर दादा के लिए अपने बस की कोई बात उठा रखता तो आज रोते न बनता । अपना ही चित्त अपने को धिक्कारता । नहीं तो मुझे इस घड़ी ऐसा जान पड़ता है कि मेरा उद्धार एक भारी ऋण से हो गया। उनकी आत्मा सुख और शान्ति से रहेगी तो मेरा सब तरह कल्याण ही होगा।

बाबू चैतन्यदास सिर झुकाए ये बातें सुन रहे थे । एक-एक शब्द उनके हृदय में शूल के समान चुभता था। इस उदारता के प्रकाश में उन्हें अपनी हृदय-हीनता, अपनी आत्म-शून्यता अपनी भौतिकता अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी । उनके चित्त पर इस घटना का कितना प्रभाव पड़ा यह इसी से अनुमान किया जा सकता हैं कि प्रभुदास के अन्त्येष्टि संस्कार में उन्होंने हजारों रुपये खर्च कर डाले उनके सन्तप्त हृदय की शान्ति के लिए अब एकमात्र यही उपाय रह गया था।

[सरस्वती - जून, 1920]

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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

UP Board Class 12 कक्षा १२ साहित्यिक हिंदी /उत्तर प्रदेश बोर्ड /sahitiyik hindi

Essays
लेखक का नाम    पाठ

1.वासुदेवशरण अग्रवाल                राष्ट्र् का स्वरुप
2.जैनेंद्र कुमार                             भाग्य और पुरुषार्थ 

3.कन्हैयालाल मिश्र ’प्रभाकर         राबर्ट नर्सिंग होम में
4.डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी            अशोक के फूल
5 अज्ञेय                                        सन्नाटा 

6.प्रो. जी. सुंदर रेड्डी                      भाषा और आधुनिकता
7.हरिशंकर परसाई                      निंदा रस

8.मोहन राकेश                           आखिरी चट्टान

काव्य खण्ड
कवि का नाम    शीर्षक का नाम
1.भारतेंदु हरिश्चंद्र                                प्रेम-माधुरी, यमुना-छवि
2.जगन्नाथ ‘रत्नाकर’                             उद्धव –प्रसंग, गंगावतरण
3.अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध              पवन दूतिका
4 मैथिलीशरण गुप्त                              कैकेयी का अनुताप गीत
5 जयशंकर प्रसाद                                 गीत , श्रद्धा-मनु
6 सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’            बादल- राग, Badal Rag bhaag 2      सन्ध्या-सुंदरी
7 सुमित्रानन्द पन्त                             नौका विहार, परिवर्तन, बापू के प्रति
8 महादेवी वर्मा                                             गीत  जाग तुझको दूर जाना  , मैं नीर भरी दुःख की बदली  ,
9 रामधारी सिंह’दिनकर’                             पुरुरवा ,           उर्वशी,      अभिनव-मनुष्य
10 ’अज्ञेय’                                            मैंने आहुति बनकर देखा,      हिरोशिमा       विविधा
11 नरेंद्र शर्मा                                           मधु की एक बूँद
12 भवानीप्रसाद मिश्र                             बूँद टपकी एक नभ से
13 गजानन माधव मुक्तिबोध                    मुझे कदम-कदम पर
14 गिरिजाकुमार माथुर                            चित्रमय धरती
15 धर्मवीर भारती                                       साँझ के बादल
कथा साहित्य
      कहानीकार           कहानी
1. भीष्म साहनी           खून  का रिश्ता
2.फणीश्वरनाथ ‘रेणु’     पंचलाईट
3. शिवानी                  लाटी
4 अमरकांत             बहादुर
5 शिवप्रसाद सिंह      कर्मनाशा की हार
 

नाटक
 

नाटककार का नाम    नाटक का नाम
1.विष्णु प्रभाकर    कुहासा और किरण
[मेरठ, मुरादाबाद, सुल्तानपुर,रायबरेली, बदायूँ, गाजियाबाद, पीलीभीत,लखीमपुर-खीरी,आजमगढ,झाँसी,बलिया,मऊ जनपदों के लिए अधिकृत]
2.हरिकृष्ण ‘प्रेमी’    आन का मान
[वाराणसी, इटावा, एटा, फर्रुखाबाद, लखनऊ, बरेली, उन्नाव,शाहजहाँपुर, हमीरपुर जनपदों के लिए अधिकृत ]
3.पं.लक्ष्मीनारायण मिश्र    गरुड.ध्वज
[जौनपुर, गोरखपुर, गोंडा, बहराइच, प्रतापगढ, फैजाबाद, आगरा, फिरोजाबाद, बिजनौर,सीतापुर, ललितपुर,फतेहपुर और महराजगंज जनपदों के लिए अधिकृत]
4.डा. गंगासहाय ‘प्रेमी’    सूत-पूत्र
[गाजीपुर, मैनपुरी, बाराबंकी, सहारनपुर,मुजफ्फरनगर, हरदोई, अलीगढ, जालौन, और इलाहाबाद जनपदों के लिए अधिकृत]
5.व्यथित हृदय    राजमुकुट
[कानपुर, मथुरा, बस्ती, बुलंद्शहर, मिर्जापुर, रामपुर, कानपुर देहात, बाँदा, सिद्धार्थनगर , देवरिया और सोनभद्र जनपदों के लिए अधिकृत]
खण्ड काव्य
कवि का नाम    खण्ड काव्य का नाम

1.सुमित्रानंदन पंत    मुक्तियज्ञ
[जौनपुर, फैजाबाद, कानपुर, मुरादाबाद, एटा, ललितपुर तथा कानपुर देहात जनपदों के लिए अधिकृत]
2.द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी    सत्य की जीत
[लखनऊ, रामपुर, इटावा,झांसी, बलिया, पीलीभीत, बीजनौर, प्रतापगढ तथा बदायूँ जनपदों के लिए]
3.रामधारी सिंह दिनकर    रश्मिरथी
[बुलंदशहर,मथुरा,मुजफ्फरनगर,उन्नाव, वाराणसी , फतेहपुर तथा देवरिया जनपदों के लिए]
4.गुलाब खन्डेलवाल    आलोक-वृत्त
[सहारनपुर,अलीगढ, इलाहाबाद,सीतापुर, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, सोनभद्र,तथा मिर्जापुर जनपदों के लिए]
5.रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’    त्यागपथी
[गाजीपुर, सुल्तानपुर, फिरोजाबाद, आगरा, लखीमपुर-खीरी,गोरखपुर, बरेली, जालौन, गोंडा, शाहजहांपुर,बाराबंकी और महराजगंज जनपदों के लिए]
6.डा. शिवबालक शुक्ल    श्रवण कुमार
[मेरठ, आज़मगढ,बहराइच गाजियाबाद, हमीरपुर, मऊ, हरदोई, बांदा, रायबरेली, बस्ती, तथा सिद्धार्थनगर जनपदों के लिए]

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शनिवार, 22 अगस्त 2020

काल : वर्तमान,भूत और भविष्य /Tense Hindi Grammar

 काल का अर्थ होता है ‘समय‘।

काल की परिभाषा

क्रिया के जिस रूप में कार्य करने या होने के समय का ज्ञान होता है,उसे काल कहा जाता है।

या 

 क्रिया के उस रूपांतर को काल कहा जाता है जिससे उसके कार्य व्यापार का समय और उसके पूर्ण अथवा अपूर्ण आस्था का बोध होता हो।


जैसे-वह खाता है । वह खा रहा है । वह खाता था । वह खा चुका था । वह खा रहा था।
काल के तीन मुख्य भेद हैं-
    (1)वर्तमान काल (present Tense) - जो समय चल रहा है।
    (2)भूतकाल(Past Tense) - जो समय बीत चुका है।
    (3)भविष्यत काल (Future Tense)- जो समय आने वाला है।

1. वर्तमान काल - क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो कि कार्य चल रहे समय में हो रहा है ,उसे वर्तमान काल कहते हैं ; जैसे -
माली पौधा लगा रहा  है।

वर्तमान काल के तीन भेद हैं
1. सामान्य वर्तमान - क्रिया के जिस रूप से वर्तमान काल में किसी क्रिया के करने या होने का बोध होता हो , उसे सामान्य वर्तमान कहते हैं; जैसे -

बच्चा  स्कूल जाता है।


2. संदिग्ध वर्तमान - क्रिया के जिस रूप से किसी कार्य के वर्तमान काल में होने में संदेह पाया जाए , उसे संदिग्ध वर्तमान कहते हैं ; जैसे -

वह फिल्म देख रहा होगा।


3. अपूर्ण वर्तमान - क्रिया के जिस रूप से यह बोध हो की कार्य वर्तमान  काल मे आरम्भ होकर अभी जारी है , उसे अपूर्ण वर्तमान कहते हैं ; जैसे -
कार सड़क पर दौड़ रही है। 


2. भूतकाल

भूतकाल दो शब्दों के मेल से बना है – भूत + काल। भूत का अर्थ होता है – बीत गया और काल को कहा जाता है – समय अर्थात् जो समय बीत गया हो।
क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का बोध हो या वाक्य में प्रयुक्त क्रिया के जिस रूप से बीते समय में (भूत) क्रिया का होना पाया जाता है। उसे हम भूतकाल कहते है।
दूसरे शब्दों में – जिस क्रिया से कार्य के समाप्त होने का पता चले उसे भूतकाल कहते हैं। इसकी पहचान वाक्यों के अंत में था, थे, थी आदि से होती है।

उदाहरण के लिए –
(i) वह दिल्ली गया था।
(ii) कल वह  लखनऊ में  था।

 भूतकाल के छः भेद होते हैं

  1.     सामान्य भूतकाल
  2.     आसन्न भूतकाल
  3.     पूर्ण भूतकाल
  4.     अपूर्ण भूतकाल
  5.     संदिग्ध भूतकाल
  6.     हेतु-हेतुमद भूतकाल


 1. सामान्य भूतकाल - क्रिया का वह रूप जो सामान्यतः किसी कार्य का बीते हुए समय में होना बताता है, उसे सामान्य भूतकाल कहते हैं ; जैसे -
राधा विद्यालय गई।
फल वाले ने फल बेचे।

2. आसन्न भूतकाल - क्रिया के जिस रूप से किसी कार्य का अभी-अभी समाप्त होने का बोध हो, उसे आसन्न भूतकाल कहते हैं ; जैसे -
मीनू  ने  जलेबी खाई।
बच्चों ने  सारा काम कर लिया है।

3. पूर्ण भूतकाल - क्रिया के जिस रूप से किसी कार्य का भूतकाल में बहुत पहले ही होने का बोध हो, उसे पूर्ण भूतकाल कहते हैं; जैसे -
मोना चित्र बना चुकी थी।
मोहित को पुरस्कार मिल चुका था।

4. अपूर्ण भूतकाल - क्रिया के जिस रूप से किसी कार्य के भूतकाल में शुरू होने, किन्तु समाप्ति का पता न होने की सूचना मिले, उसे अपूर्ण भूतकाल कहते हैं; जैसे -
लड़के खेल रहे थे।

5. संदिग्ध भूतकाल - क्रिया के जिस रूप से किसी कार्य के भूतकाल में होने का संदेह हो, उसे संदिग्ध भूतकाल कहते हैं ; जैसे -
माँ ने खाना  बना लिया होगा।

6. हेतु-हेतुमद भूत - क्रिया के जिस रूप से किसी कार्य का भूतकाल में दूसरी क्रिया पर निर्भर होने का ज्ञान होता हो, उसे हेतु-हेतुमद भूतकाल कहते हैं ; जैसे -
यदि परिश्रम करते, तो सफलता मिलती।
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3. भविष्य काल
इस काल के माध्यम से आने वाले समय के कार्य को बताया जाता है अर्थात वो क्रिया जो भविष्य में किसी कार्य के पूर्ण होने को बताती है तो उसे भविष्य काल कहा जाता है.


  •     इस काल के अंत में गा है, गी है, गें हैं आदि शब्द आते हैं

भविष्यत/भविष्य  काल के दो भेद होते हैं

1. सामान्य भविष्यत -

  क्रिया के जिस रूप से यह बोध होता है कि क्रिया का व्यापार आने वाले समय में होगा , उसे सामान्य भविष्यत कहते हैं ; जैसे -
वह कल दिल्ली जाएगा ।
2. सम्भाव्य भविष्यत -  

क्रिया के जिस रूप से भविष्यत काल में किसी कार्य के होने की संभावना पायी जाए , उसे सम्भाव्य भविष्यत कहते हैं ; जैसे -
शायद निरीक्षक  कल आ जाएँ।

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