बुधवार, 31 जुलाई 2019

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

अवतार सिंह पाश - सबसे खतरनाक Aaroh 1 NCERT

सबसे खतरनाक

-अवतार सिंह पाश

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विशेष-

भाषा व्यंजना प्रधान है/सांकेतिक भाषा।
मुक्त छंद /खड़ी बोली है/उर्दू शब्दावली का प्रयोग
संवेदनशून्यता पर गहरा व्यंग्य ।
 ‘जमी बर्फ’, ‘मुहब्बत से चूमना’, ‘अंधेपन की भाप’, ‘रोजमर्रा के क्रम को पीती’ आदि नए भाषिक प्रयोग
 ‘अंधेपन की भाप’/आत्मा का सूरज /‘जिस्म के पूरब’ में रूपक अलंकार
 गीत का मानवीकरण
‘मिचों की तरह’, ‘गुंडों की तरह’ में उपमा अलंकार
‘जुगनू की लौ’ से साधनहीनता/

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी
सबसे ख़तरनाक नहीं होती


सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए
[यह कविता पंजाबी भाषा से अनूदित]
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  •  कवि पाश का मूल नाम अवतार सिंह संधू है। इनका जन्म 1950 ई. में पंजाब राज्य के जालंधर जिले के तलवंडी सलेम गाँव में हुआ।
  • अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया और सिआड़, हेमज्योति, हॉक, एंटी-47 जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। 
  •  कुछ समय तक अमेरिका में रहे। 
  •  मृत्यु 1988 ई. में हुई।
  • इनकी रचनाएँ -
    लौह कथा, उड़दें बाजां मगर, साडै। समिया बिच, लड़ेंगे साथी (पंजाबी); बीच का रास्ता नहीं होता, लहू है कि तब भी गाता है (हिंदी अनुवाद)।

अक्क महादेवी Aaroh 1 NCERT

अक्क महादेवी


1. हे भूख! मत मचल

 इन्द्रियों का काम है अपने को तृप्त करना इन्द्रियों की तृप्ति के फेर में मानव जीवन भर भटकता रहता है। इन्द्रियाँ मानव को विषय-वासनाओं के जाल में उलझाकर लक्ष्य पथ से भटकाती रहती है। ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में तो इन्द्रियाँ सबसे बड़ी बाधक होती है यह साधक को संसार की मोह-माया में उलझाकर रखती है और ईश्वर भक्ति के मार्ग की ओर बढ़ने नहीं देती। अत: यह सरासर सत्य है की लक्ष्य प्राप्ति में इन्द्रियाँ बाधक होती है।

‘अपना घर’ से यहाँ आशय  व्यक्तिगत मोह-माया में लिप्त जीवन से है। व्यक्ति इस घर के आकर्षण-जाल में उलझकर ईश्वर प्राप्ति के लक्ष्य में पीछे रह जाता है। कवयित्री ऐसे मोह-माया में लिपटे जीवन को छोड़ने की बात करती है क्योंकि यदि ईश्वर को पाना है तो व्यक्ति को इस जीवन का त्याग करना होगा। ईश्वर भक्ति में सबसे बड़ी बाधा यही होती है। अपने घर को छोड़कर ही ईश्वर के घर में कदम रखा जा सकता है।



2. हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर

हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर 

मँगवाओ मुझसे भीख और कुछ ऐसा करो 
कि भूल जाऊँ अपना घर 
पूरी तरह झोली फैलाऊँ और न मिले भीख 

कोई हाथ बढ़ाए कुछ देने को तो वह गिर जाए नीचे 
और यदि मैं झुकूँ उसे उठाने तो कोई कुत्ता आ जाए 

और उसे झपटकर छीन ले मुझसे।

इस वचन में ईश्वर से सबकुछ छीन लेने की बात की गई है। कवयित्री चाहती है कि वह सांसारिक वस्तुओं से पूरी तरह खाली हो जाए। उसे खाने के लिए भीख तक न मिले। ऐसी परिस्थिति आने पर उसका अंहकार भाव नष्ट हो जाएगा और वह प्रभु भक्ति में समर्पित हो जाएगी।

दुष्यंत कुमार - ग़ज़ल - कहाँ तो तय था चरांगा हरेक घर के लिए Aaroh 1 NCERT

दुष्यंत कुमार - ग़ज़ल  Aaroh 1 NCERT
साए में धूप से एक ग़ज़ल
कहाँ तो तय था ....
लेखक परिचय और  व्याख्या सहित
https://youtu.be/oCdCKMfILpg
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कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये. 
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त्रिलोचन - चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती Aaroh 1 NCERT

चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
 -त्रिलोचन 
Aaroh 1 NCERT
सार :-

‘चंपा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती ’ कविता धरती संग्रह में संकलित है।

 यह कविता  पलायन के लोक अनुभवों को मार्मिकता से अभिव्यक्त करती है।

इसमें ‘अक्षरों’ के लिए ‘काले-काले’ विशेषण का प्रयोग किया गया है जो एक ओर शिक्षा-व्यवस्था के अंतर्विरोधों को उजागर करता है तो दूसरी ओर उस दारुण यथार्थ से भी हमारा परिचय कराता है जहाँ आर्थिक मजबूरियों के चलते घर टूटते हैं।

 काव्य नायिका चंपा  के मन में  भविष्य को लेकरअनजान खतरा है। वह कहती है ‘कलकत्ते पर बजर गिरे।” कलकत्ते पर वज़ गिरने की कामना, जीवन के खुरदरे यथार्थ के प्रति चंपा के संघर्ष और जीवन को प्रकट करती है।
चंपा गाँव की अनपढ़ बालिका है। उसे अक्षर ज्ञान नहीं है।
जब कवि पढ़ने लगता है तब वह वहाँ आकर चुपचाप खड़ी-खड़ी सुनती रहती है। वह  सुंदर ग्वाले की एक लड़की है ,गाएँ-भैसें चराने का काम करती है। वह अच्छी व चंचल है।
जब कवि  पढ़ता है तो चुपचाप पास खड़ी होकर आश्चर्य से सुनती है।
कभी वह कवि की कलम चुरा लेती है तो कभी कागज। इससे कवि परेशान हो जाता है।
चंपा कहती है कि दिन भर कागज लिखते रहना क्या अच्छा है? कवि हँस देता है।
एक दिन कवि ने चंपा से पढ़ने-लिखने के लिए कहा। उन्होंने इसे गाँधी बाबा की इच्छा बताया। चंपा ने कहा कि गाँधी जी को बहुत अच्छे बताते हो, फिर वे पढ़ाई की बात कैसे कहेंगे? कवि ने कहा कि पढ़ना अच्छा है। लेकिन वह कहती है कि नहीं पढ़ेगी।

 कवि समझाता है कि शादी के बाद तुम ससुराल जाओगी। तुम्हारा पति कलकत्ता काम के लिए जाएगा। अगर तुम नहीं पढ़ी तो उसके पत्र कैसे पढ़ोगी या अपना संदेशा कैसे दोगी? इस पर चंपा ने कहा कि तुम पढ़े-लिखे झूठे हो। वह शादी नहीं करेगी। यदि शादी करेगी तो अपने पति को कभी कलकत्ता नहीं जाने देगी। कलकत्ते पर बजर गिरे।” अर्थात कलकत्ता पर भारी विपत्ति आ जाए, ऐसी कामना वह करती है।

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भवानी प्रसाद मिश्र - घर की याद Aaroh 1 NCERT

 घर की याद  (कविता )
--  भवानी प्रसाद मिश्र

सुमित्रानंदन पंत - वे आँखें /व्याख्या और प्रश्न-उत्तर सहित Aaroh 1 NCERT

 वे आँखें  (कविता )
सुमित्रानंदन पंत
पूरी कविता
सप्रसंग व्याख्या और प्रश्न-उत्तर सहित
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अधिकार की गुहा सरीखी
उन अखिों से डरता है मन,
भरा दूर तक उनमें दारुण
दैन्य दुख का नीरव रांदन!

वह स्वाधीन किसान रहा,
अभिमान भरा अखिों में इसका,
छोड़ उसे मंझधार आज
संसार कगार सदृश बह खिसका।
लहराते वे खेत द्वगों में
हुआ बेदखल वह अब जिनसे,
हसती थी उसके जीवन की
हरियाली जिनके तृन-तृन से !

आँखों ही में घूमा करता
वह उसकी अखिों का तारा,
कारकुनों की लाठी से जो
गया जवानी ही में मारा।

बिका दिया घर द्वार,
महाजन ने न ब्याज की कड़ी छोड़ी,
रह-रह आँखों में चुभती वह
कुक हुई बरधों की जोड़ी !

उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
अह, आँखों में नाचा करती
उजड़ गई जो सुख की खेती !

बिना दवा-दपन के घरनी
स्वरगा चली,-अखं आती भर,
देख-रेख के बिना दुधमुही
बिटिया दो दिन बाद गई मर!

घर में विधवा रही पताहू,
लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
 पकडु मॅाया, कोतवाल ने,
डूब कुएँ में मरी एक दिन।

खैर , पैर की जूती[उपेक्षित], जोरू
न सही एक, दूसरी आती,
पर जवान लड़के की सुध कर
साँप लौटते, फटती छाती।

पिछले सुख की स्मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक हैं लाती,
तुरत शून्य में गड़ वह चितवन
तीखी नोंक सदृश बन जाती।

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